ख्वाहिश चाँद छूने की...

ख्वाहिश चाँद छूने की...

चाँद को छूने और पा जाने की थी ख्वाहिश जमाने से मेरी।
निभाने में दुनिया के दस्तूर बस न हो पाईं जो पूरी।।

सोचा था उम्र तो कट ही रही है बेमकसद, अधूरी मेरी।
वजूद नहीं मेरा मुकम्मल तो ख्वाहिशें भी अधूरी सही।।

पर ख्वाहिशें भी कहीं चलती हैं किसी की सोच से।
न बदलती हैं न मरती हैं, बावजूद हजार बंदिशों के।।

उंगलियाँ तो उठी हैं चाँद और उसकी चाँदनी पर भी।
फिर बिसात ही क्या मेरी और मेरी ख्वाहिशों की भी।

चाँद को  ले आएंगे फलक से तोड़ कर अब जमीन पर।
न करेंगे काली रातों के साये असर मेरी इन कोशिशों पर ।।

आज फिर से दिखा वही चाँद फिर वही ख्वाहिशें जागी हैं।
हमने भी दिल से चाँदरात में इनके पूरे होने की दुआ  मांगी है।।

धन्यवाद

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