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Showing posts from July, 2018

बचपन

बेतहाशा चली आती हैं यादें, निकल कर मन के झरोखों से, पता ही न चला फिसल कर चला गया बचपन कब हथेली से। बारिशों का मिट्टी पर पड़ना वो सोंधी सी खुशबू का आना, वो बचपन की यादें जिनका लगा रहता है हमेशा आना-जाना। बारिश मे भरी गली मे चलाना वो बनाकर कागज की नाव, फिर चुपके-चुपके से लेकर आना घर में कीचड़ भरे गंदे पाँव। माँ का वो बराबर डाँटते जाना साथ मे मेरी फिकर करते जाना, भइया का मुझको चिढ़ाना और मेरे रोने पर मुझे मनाने आना। गुस्से मे भी माँ का प्यार झलकना और माँ के हाथों से खाना,  हर बात पर खिलखिला कर बेफिक्री से हँस कर भाग जाना। मिट्टी के घरौंदे बनाना, पेड़ से तोड़ना इमली लेना चटखारे, माली न कर दे शिकायत ,फिरते थे यहाँ-वहाँ इसी डर के मारे। मम्मी से छिपाकर के पहनना वो सुंदर सी कामदार साडी़, चला करती थी निराले खेलों से बचपन की वो शानदार गाड़ी। स्कूल मे फिर जाने का, फिर से बच्चा बनने को जी करता है, एक बार दोबारा गुड़िया से खेलने का मेरा बहुत जी करता है। क्यों नहीं लौटता मेरा बचपन वही बेफिकर जीने का तरीका, अब क्यों अपेक्षित है मुझसे हर किसी को जीवन का सलीका। सताती हैं यादें ...

ख्वाहिश चाँद छूने की...

ख्वाहिश चाँद छूने की... चाँद को छूने और पा जाने की थी ख्वाहिश जमाने से मेरी। निभाने में दुनिया के दस्तूर बस न हो पाईं जो पूरी।। सोचा था उम्र तो कट ही रही है बेमकसद, अधूरी मेरी। वजूद नहीं मेरा मुकम्मल तो ख्वाहिशें भी अधूरी सही।। पर ख्वाहिशें भी कहीं चलती हैं किसी की सोच से। न बदलती हैं न मरती हैं, बावजूद हजार बंदिशों के।। उंगलियाँ तो उठी हैं चाँद और उसकी चाँदनी पर भी। फिर बिसात ही क्या मेरी और मेरी ख्वाहिशों की भी। चाँद को  ले आएंगे फलक से तोड़ कर अब जमीन पर। न करेंगे काली रातों के साये असर मेरी इन कोशिशों पर ।। आज फिर से दिखा वही चाँद फिर वही ख्वाहिशें जागी हैं। हमने भी दिल से चाँदरात में इनके पूरे होने की दुआ  मांगी है।। धन्यवाद